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कामशक्ति बढ़ाने के आयुर्वेदिक नुस्खे, kamshakti badhane ke ayurvedic nuskhe

कामशक्ति बढ़ाने के आयुर्वेदिक नुस्खे
कामशक्ति बढ़ाने के आयुर्वेदिक नुस्खे

मित्रों आइये जानते हैं नामर्दी ,सेक्स में आई कमजोरी, शिथिलता, नपुंसकता की घरेलू दवाइयां जिसमें से अधिकांश आप सभी के किचन में उपलब्ध हैं कुछ सूखे मेंवे का प्रयोग विधि जिससे आप की कामशक्ति बढ़ जाएंगी आप इन उपायों को अवश्य आजमाए आपको फायदा होगा तो आइए जानते हैं ये नुख्शे

कामशक्ति बढ़ाने के आयुर्वेदिक नुस्खे,

बादाम की गिरी, मिश्री, सौंठ और काली मिर्च कूट-पीसकर चूर्ण बनाकर, कुछ हफ्ते खाने से और ऊपर से दूध पीने से धातु (वीर्य) का खत्म होना बन्द होता है।

यौनशक्ति बढ़ाने के उपाय

बादाम को गर्म पानी में रात में भींगने दें। सुबह थोड़ी देर तक पकाकर पेय बनाकर 20 से 40 मिलीलीटर रोज़ पीऐं, इससे मूत्रजनेन्द्रिय संस्थान के सारे रोग खत्म हो जाते हैं।

kamshakti badhane ke ayurvedic nuskhe

कौंच के बीज के चूर्ण में तालमखाना और मिश्री का चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर 3 - 3 ग्राम की मात्रा में खाने और दूध के साथ पीने से नपुंसकता (नामर्दी) ख़त्म होती है।

कौंच के बीजों की गिरी तथा राल ताल मखाने के बीज। दोनों को 25 - 25 ग्राम की मात्रा में लेकर पीसकर छान लें, फिर इसमें 50 ग्राम मिस्री मिला लें। इसमें 2 चम्मच चूर्ण रोज़ दूध के साथ खाने से लाभ होता है।

गिलोय, बड़ा गोखरू और आंवला सभी बराबर मात्रा में लेकर कूट पीसकर चूर्ण बना लें। 5 ग्राम चूर्ण रोज़ मिस्री और घी के साथ खाने से प्रबल मैथुन शक्ति विकसित होती है।

जायफल का चूर्ण लगभग आधा ग्राम शाम को पानी के साथ खाने से 6 हफ्ते में ही धातु (वीर्य) की कमी और मैथुन में कमजोरी दूर होगी।

जायफल का चूर्ण एक चौथाई चम्मच सुबह -शाम शहद के साथ खाऐं और इसका तेल सरसों के तेल में मिलाकर शिश्न (लिंग) पर लगाएं।

बेल के पत्तों का रस 20 मिली लीटर निकालकर, उसमें सफेद जीरे का चूर्ण 5 ग्राम, मिस्री का चूर्ण 10 ग्राम के साथ खाने और दूध पीने से शरीर की कमजोरी ख़त्म होती है।

सफेद मूसली और मिस्री, बराबर मिलाकर पीसकर चूर्ण बना कर रखें और चूर्ण बनाकर 5 ग्राम सुबह - शाम दूध के साथ खाने से शरीर की शक्ति और खोई हुई मैथुन शक्ति, वापस मिल जाती है।

सफेद मूसली, सतावर, असगंध 50 - 50 ग्राम कूट छान कर, 10 ग्राम दवा सोते समय 250 मिली लीटर, लगभग एक गिलास गर्म दूध में मिश्री के संग मिलाकर लें।
सफेद मूसली और मिस्री, बराबर मात्रा में कूट पीसकर चूर्ण बनाकर 6 ग्राम की मात्रा में खाने से नपुंसकता (नामर्दी) खत्म होती है।

भीगे चने सुबह - शाम चबाकर खाने से ऊपर से बादाम की गिरी खाने से, मैथुन शक्ति बढ़ती है और नंपुसकता ख़त्म होती है।
कामेच्छा बढ़ाने के उपाय
शतावर, असगंध, एला, कुलंजन और वंशलोचन का चूर्ण बनाकर रखें। 3 ग्राम चूर्ण में 6 ग्राम मिश्री को मिलाकर खाने से और फिर ऊपर से दूध पीने से कुछ महीनों में नपुंसकता (नामर्दी) ख़त्म होती है।

मर्दाना ताकत बढ़ाने के उपाय

शतावर का चूर्ण 10 ग्राम से 20 ग्राम को चीनी मिले दूध में, सुबह - शाम डालकर पीऐं, इससे नपुंसकता दूर होती है। शरीरकी कमजोरी भी दूर होती है।
सेमल के पेड़ की छाल के 20 मिली लीटर रस में मिस्री मिलाकर, पीने से शरीर में वीर्य और मैथुन शक्ति बढ़ती है।

महिलाओं के लिए कामेच्छा बढ़ाने के घरेलू नुस्खे

10 ग्राम सेमल के चूर्ण और चीनी को 100 मिली लीटर पानी के साथ घोट कर सुबह - शाम लेने से बाजीकरण यानी संभोग शक्ति ठीक होती है और नपुंसकता भी दूर हो जाती है।
उत्तेजना बढ़ाने के उपाय
बड़ी गोखरू का फांट या घोल सुबह - शाम लेने से काम शक्ति यानी संभोग की वृद्धि दूर होती है। 250 मिलीलीटर को खुराक के रूप में सुबह और शाम सेवन करें।
मित्रों ऊपर मैंने एक साथ कई विधियां आप सभी को बताया है आप उपरोक्त कोई एक विधि आजमाये आपको फायदा होगा।

कैंसर का इलाज नीम से कैसे संभव है? cancer ka ilaj neem se kaise sambhav hai

cancer ka ilaj neem se
cancer ka ilaj neem se

‘गांव का दवाखाना’ कही जाने वाले नीम सैकड़ों गुणों से परिपूर्ण हैं। ये कई तरह के रोगों के इलाज में काम आता है। नीम को संस्कृत में ‘अरिष्ट’ भी कहा जाता है, जिसका मतलब होता है श्रेष्ठ, पूर्ण और कभी खराब न होने वाला। नीम के अर्क में मधुमेह यानी डायबिटीज़, बैक्टिरिया और वायरस से लड़ने के गुण पाए जाते हैं। नीम के तने, जड़, छाल और कच्चे फलों में शक्ति-वर्धक और मियादी रोगों से लड़ने का गुण भी पाया जाता है। इसकी छाल खासतौर पर मलेरिया और त्वचा संबंधी रोगों में बहुत उपयोगी होती है।

नीम का पत्ते से कैंसर का उपचार

नीम के पत्ते भारत से बाहर ३४ देशों को निर्यात किए जाते हैं। इसके पत्तों में मौजूद बैक्टीरिया से लड़ने वाले गुण मुंहासे, छाले, खाज-खुजली, एक्जिमा वगैरह को दूर करने में मदद करते हैं। इसका अर्क मधुमेह, कैंसर, हृदयरोग, हर्पीस, एलर्जी, अल्सर, हिपेटाइटिस (पीलिया) वगैरह के इलाज में भी मदद करता है। दांत का दर्द है, तो इसकी दातून का इस्तेमाल किया जाता है।

बैक्टीरिया से लड़ता नीम

आपके भीतर इतने सारे जीव यानि बैक्टीरिया हैं कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते। इनमें से ज्यादातर बैक्टीरिया हमारे लिए फायदेमंद होते हैं। इनके बिना हम जिंदा नहीं रह सकते, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जो हमारे लिए मुसीबत का कारण बन सकते हैं। अगर आप नीम का सेवन करते हैं, तो वह हानिकारक बैक्टीरिया को आपकी आंतों में ही नष्ट कर देता है। नहाने से पहले अपने बदन पर नीम का लेप लगा कर कुछ वक्त तक सूखने दें, फिर उसको पानी से धो डालें। सिर्फ इतने से ही आपका बदन अच्छी तरह से साफ हो सकता है। इसके अलावा नीम के कुछ पत्तों को पानी में डाल कर रात भर छोड़ दें और फिर सुबह उस पानी से नहा लें।

एलर्जी के लिए नीम

नीम के पत्तों को पीस कर पेस्ट बना लें, उसकी छोटी-सी गोली बना कर सुबह-सुबह खाली पेट शहद में डुबा कर निगल लें। उसके एक घंटे बाद तक कुछ भी न खाएं, जिससे नीम ठीक तरह से आपके सिस्टम से गुजर सके। यह हर प्रकार की एलर्जी में फायदा करता है।

बीमारियों के लिए नीम

नीम कैंसर-कोशिकाओं को नष्ट कर देता है। इससे कैंसर वाली कोशिकाओं की तादाद एक सीमा के अंदर रहती है। नीम में ऐसी भी क्षमता है कि अगर आपकी रक्त धमनियों(आर्टरी) में कहीं कुछ जमना शुरु हो गया हो तो ये उसको साफ कर सकती है।

मधुमेह (डायबिटीज) के रोगियों के लिए नीम

भी हर दिन नीम की एक छोटी-सी गोली खाना बहुत फायदेमंद होता है। यह उनके अंदर इंसुलिन पैदा होने की क्रिया में तेजी लाता है।

डेंगू बुखार का इलाज, dengue bukhar ka ilaj

dengue bukhar ka ilaj
dengue bukhar ka ilaj

यदि आपके किसी भी जानकार को यह रोग हुआ हो और खून में प्लेटलेट की संख्या कम होती जा रही हो तो चार चीज़ें रोगी को दें :-
(1) अनार जूस
(2) गेहूं घास रस
(3) पपीते के पत्तों का रस
(4) गिलोय/अमृता/अमरबेल सत्व

dengue bukhar ka ilaj in hindi
अनार जूस तथा गेहूं घास रस नया खून बनाने तथा रोगी की रोग से लड़ने की शक्ति प्रदान करने के लिए है, अनार जूस आसानी से उपलब्ध है। यदि गेहूं घास रस ना मिले तो रोगी को सेब का रस भी दिया जा सकता है।

dengue bukhar ka ilaj

पपीते के पत्तों का रस सबसे महत्वपूर्ण है, पपीते का पेड़ आसानी से मिल जाता है। उसकी ताज़ी पत्तियों का रस निकाल कर मरीज़ को दिन में दो से तीन बार दें, एक दिन की खुराक के बाद ही प्लेटलेट की संख्या बढ़ने लगेगी।

dengue bukhar ka ayurvedic ilaj

गिलोय बेल की डंडी ले, डंडी के छोटे टुकड़े करे। उसे दो गिलास पानी मे उबालें, जब पानी आधा रह जाये तो ठंडा होने पर काढ़े को रोगी को पिलायें। मात्र 45 मिनट बाद cells सेल्स बढ़ने शुरू हो जाएँगे!

डेंगू बुखार का इलाज

गिलोय की बेल का सत्व मरीज़ को दिन में दो तीन बार दें, इससे खून में प्लेटलेट की संख्या बढती है, रोग से लड़ने की शक्ति बढती है तथा कई रोगों का नाश होता है। यदि गिलोय की बेल आपको ना मिले तो किसी भी नजदीकी पतंजली चिकित्सालय में जाकर “गिलोय घनवटी” ले आयें, जिसकी एक एक गोली रोगी को दिन में तीन बार दें।

डेंगू बुखार का आयुर्वेदिक इलाज

यदि बुखार एक दिन से ज्यादा रहे तो खून की जांच अवश्य करवा लें। यदि रोगी बार-बार उलटी करे तो सेब के रस में थोडा निम्बू मिलाकर रोगी को दें, उल्टियाँ बंद हो जाएंगी। यदि रोगी को अंग्रेजी दवाइयां दी जा रही है, तब भी यह (उक्त) चीज़ें रोगी की बिना किसी डर के दी जा सकती हैं।

डेंगू जितना जल्दी पकड़ में आये उतना जल्दी उपचार आसान हो जाता है और रोग जल्दी ख़त्म होता है।

अण्डकोष पर होने वाले खुजली का आयुर्वेदिक इलाज, andkosh me khujli ka ilaj

andkosh me khujli ka ilaj
andkosh me khujli ka ilaj

वैसे यह रोग साफ -सफाई की कमी ,दूसरे का आंतरिक वस्त्र पहनने, नीचे बालों में जू हो जाने से और बहुत सारे कारण है जिनसे हो जाते हैं जिससे व्यक्ति को बहुत शर्मिन्दगी महसूस तब होता हैं जब व्यक्ति समाज मे या किसी मित्रों के साथ है और अण्डकोष में खुजली होने लगे उस समय व्यक्ति चाह कर भी खुजलाहट झेलने को मजबूर हो जाता हैं तो आइए इसके कुछ घरेलू उपचारों के विषय में जानते हैं

अंडकोष की बीमारियां

अंडकोष पर खुश्की का इन्फेक्शन के कारण चमड़ी सफ़ेद पड़ जाए और उसमें तेज खुजली हो तो आप सोने से पहले नारियल का तेल अपने अंडकोष पर लगायें इससे बहुत आराम मिलेगा|
किसी हर्बल दूकान से आप छरीला का असली तेल लाये और उसे अंडकोष पर दिन में दो बार लगायें| इससे खुजली में बहुत आराम मिलेगा|

andkosh me gath

नागरमोथा को पीस कें और इसको खुजली वाले अंडकोष पर लगाने से आपको खारिश से जल्द रहत मिलेगी|
andkosh me jalan
अंडकोष की सूजन होने पर आप गर्म जल में कपडे को भिगो लिजिये और इस हलके गर्म कपडे से अंडकोष पर सेख करिए| इस नुस्खे से सूजन और दर्द दूर हो जाएगी|
andkosh par dano ka ilaj
नीम और तिल का तेल बराबर मात्र में मिला लीजिये| अब इस तेल की मिश्रण को दिन में २-3 बार अपने अद्खोश पर लगाइए| इससे खुजली, खुश्की और जलन से रहत मिलेगी|

andkosh me funsi

इसी प्रकार नीम के पत्तों को पानी में उबाल कर और पानी को छानकर अपने अंडकोष को धोने के लिए प्रयोग करने से आपकी खुजली और इन्फेक्शन की समस्या ख़तम हो जाएगी|

andkosh me khujli ka ilaj

अंडकोष की खुजली एक लिए एक और अच्छा आयुर्वेदिक नुस्झा या उपाय यह है की आप सरसों के तेल में बराबर मात्रा में प्याज़ का रस मिला लीजिये| इस मिश्रण को अपने अंडकोष पर दिन में 3 बार लगाइए| इससे खारिश मिट जाएगी|

पुरुष जननांग में खुजली के उपाय

सुहागा की 4 ग्राम मात्र 100 ml जल में घोलिये और इस जल से अपने अंडकोष की चमड़ी को धोइए| इस घरेलु नुस्खे से भी आपको बहुत जल्दी फायदा मिलेगा|

यह पोस्ट जनहित में लिखा गया है अर्थात इसे अधिक से अधिक शेयर करें धन्यवाद।

लूज मोशन का आयुर्वेदिक इलाज, loose motions ka ayurvedic ilaj

loose motions ka ayurvedic ilaj
loose motions ka ayurvedic ilaj

loose motions ka ayurvedic ilaj

मित्रों आज आपको बताएंगे एक ऐसी दवाई जो एक साथ कई बीमारियों में कारगर है विशेष कर संग्रहणी ,लूज मोशन जिसे अतिसार कहते हैं में लाभ पहुँचा कर बीमारी जड़ से ठीक कर देता है।

तो आइए जानते हैं इस फार्मूला के विषय में
सोंठ ,कालीमिर्च, पीपल,इन्द्रजौ ,नीम की छाल ,चिरायता , भांगरा, चीता, कुटकी ,पाठा, दारू हल्दी और अतीस सबको 20ग्राम की मात्रा एवं कूड़े की छाल सभी दवाइयों के वजन के बराबर लेकर चूर्ण बनावें। आपकी दवाई तैयार

सेवन विधि
1 ग्राम से लेकर 2 ग्राम तक कि मात्रा शहद से देनी चाहिए ।
दवाई की मात्रा उम्र और शारिरिक स्वास्थ्य के हिसाब से देनी चाहिए

loose motion in hindi

नोट:- आयुर्वेदिक वैद्य जो प्रेक्टिस करते हैं इस दवाई को उपरोक्त विधि से बना कर अपने मरीजों को दे सकते हैं।

loose motion ki dawai

ये दवाई पूर्ण सुरक्षित ,पाचन एवं ग्राही (दस्त को रोकने वाला )है।इसके सेवन से प्यास, अरुचि ,ज्वर में होने वाले अतिसार ,प्रमेह ,संग्रहणी, गुल्म ,प्लीहा व शोथ में अच्छा कार्य करती है।

लूज मोशन का आयुर्वेदिक इलाज

आप इसे घर पर बना सकते हैं ध्यान रखें जो भी दवाई खरीदे वह शुद्ध व ताजा हो कोई भी काष्ट औषधी जब एक साल से ज्यादा पुरानी हो जाती हैं तो अपना गुण खो देती है इसलिए विश्वसनीयता अति आवश्यक है ।

धन्यवाद मित्रों आप इस पोस्ट को अधिक से अधिक शेयर करे जिससे सबको आयुर्वेद की जानकारी हो सके

स्टीविया चबाओ, मधुमेह भगाओ, stevia chabao, madhumeh bhagao,

स्टीविया चबाओ, मधुमेह भगाओ,
स्टीविया चबाओ, मधुमेह भगाओ,

स्टीवविया चबाने से मधुमेह जैसी खतरनाक बीमारी का ईलाज संभव है। भारत में हर पांचवा आदमी डायबिटीज से ग्रस्त है। कई राज्यों में यह महामारी बन गई है। इसके बचाव के लिए कई घरेलू नुस्खे और मेडिकल इलाज हैं,

लेकिन एक आयुर्वेदिक पौधा है जिसका सेवन करने से इस बीमारी से राहत मिलती है। यह आयुर्वेदिक पौधा है स्टीविया। हालांकि यह शहद और गन्ने से बहुत मीठा होता है लेकिन यह पौधा मधुमेह रोगियों के लिए बहुत ही फायदेमंद है। स्टीविया को आयुर्वेदिक चीनी भी कहा जाता है। स्टीविया पैंक्रियाज से इंसुलिन को छोडने में बहुत सहायक होता है।

क्या है स्टीविया

स्टीविया एक ऐसा पौधा है जो चीनी से भी मीठा होता है। दुनियाभर के देशों में इसका उपयोग किया जाता है। यह पौधा दक्षिण अमरीका में पाया जाता है। इसके पत्तों का इस्तेमाल लोग सालों से कर रहे हैं। इसका मुख्य तत्व स्टेवियोसाइड है जो कि वस्तुत: कैलोरी रहित होता है। इसे खाने से खून में शुगर की मात्रा नहीं बढती है।

मधुमेह रोगी स्टीविया का सेवन कैसे करें

डायबिटीज के मरीजों के लिए मीठा खाना मना होता है, लेकिन स्टीविया जो कि चीनी से कई गुना मीठा होता है, उसे मधुमेह रोगी खा सकते हैं यह नुकसान नहीं करेगा।
अगर मधुमेह के मरीज कोई अन्य मिठाई खा रहे हैं तो उसके प्रभाव को कम करने के लिए मीठा खाने के तुरंत बाद आयुर्वेदिक पौधे स्टीविया की कुछ पत्तियां चबा लें।
स्टीविया पौधे की मिठास गन्ने और शहद से तीन सौ गुणा अधिक होती है, इसके बावजूद यह फैट व शुगर से मुक्त है।

स्टीविया इतना अधिक मीठा होने के बावजूद भी शुगर को कम तो करता ही है साथ ही शुगर को बढ़ने से रोकने में भी सहायक है।

खाना खाने से बीस मिनट पहले या खाना खाने के बीस मिनट बाद स्टीविया की पत्तियों का सेवन करना चाहिए, यह बहुत फायदेमंद होता है।

दुनियां भर में पिछले कई सालों से स्टीविया का स्वीटनर और मेडिसिन के रूप में उपयोग किया जा रहा है। विश्व के कई देशों की सरकारें इस पौधे को मान्यता दे चु‍की हैं।
स्टीविया शुगर का अद्भुत अल्टरनेटिव होने के अलावा शुगर के मरीजों के लिए एकमात्र नेचुरल स्वीटनर है। इसमें शुगर की तरह फैट और कैलोरी नहीं होती है।
स्टीविया पैंक्रियाज से इंसुलिन को छोडने में अहम भूमिका निभाता है। यह शुगर के मरीजों के लिए वरदान है।

स्टीविया न केवल शुगर बल्कि ब्लड प्रेशर, हाईपरटेशन, दांतों के लिए, वजन कम करने, गैस और कब्ज, पेट की जलन, दिल की बीमारी, चमडे़ के रोग और चेहरे की झुर्रियों के लिए बहुत फायदेमंद है।

तो जो दोस्त इस रोग से पीडित है वो बस चुटकी भर स्टीविया डालें चाय/दूध/खीर में और आनन्द उठाये भरपूर आर्गेनिक हर्बल मिठास का।

ना कोई साइड इफ़ेक्ट और ना ही कोई मिलावट।
घर मगवाईये, खुद भी खाइये और बच्चों को भी खिलाइये- और जिन्हें डायबटीज है उनके लिए तो इससे अच्छी और सस्ती कोई दवाई हो ही नही सकती।
जितनी भी शुगर फ्री क्रिस्टल बनाने वाली कम्पनियां हैं ये लूटती हैं आपको और साथ ही आपके सेहत के साथ खिलवाड़ भी करती हैं।

आप खुद इंटरनेट पर जाकर पढ़ सकते हैं कि- शुगर फ्री की सभी दवाइयों में स्टीविया ही होती है फिर भी ये दवाईयां बिना केमिकल प्रॉसेस के नहीं बनाई जाती।
अतः स्टीविया की पत्तियाँ ही सबसे ज्यादा सुरक्षित है इसे घर मे ही पाउडर बनाइये और प्रयोग कीजिये साथ ही इन विदेशी कम्पनियों को मुनाफा देना अब बन्द कीजिये।

हिन्दुओं में विवाह रात्रि में क्यों होता हैं ? hinduo me vivah ratri me kyu hota hai

हिन्दुओं में विवाह रात्रि में क्यों होता हैं
हिन्दुओं में विवाह रात्रि में क्यों होता हैं

क्या कभी आपने सोंचा है कि हिन्दुओं में रात्रि को विवाह क्यों होने लगे हैं, जबकि हिन्दुओं में रात में शुभकार्य करना अच्छा नहीं माना जाता है ?

रात को देर तक जागना और सुबह को देर तक सोने को, राक्षसी प्रव्रत्ति बताया जाता है. रात में जागने वाले को निशाचर कहते हैं. केवल तंत्र सिद्धि करने वालों को ही रात्री में हवन यज्ञ की अनुमति है.

वैसे भी प्राचीन समय से ही सनातन धर्मी हिन्दू दिन के प्रकाश में ही शुभ कार्य करने के समर्थक रहे है. तब हिन्दुओं में रात की विवाह की परम्परा कैसे पडी ?

कभी हम अपने पूर्वजों के सामने यह सवाल क्यों नहीं उठाते हैं या स्वयं इस प्रश्न का हल नहीं खोजते हैं ?

हिन्दुओं में विवाह रात्रि में क्यों होता हैं

?
दरअसल भारत में सभी उत्सव एवं संस्कार दिन में ही किये जाते थे. सीता और द्रौपदी का स्वयंवर भी दिन में ही हुआ था.

प्राचीन काल से लेकर मुगलों के आने तक भारत में विवाह दिन में ही हुआ करते थे .
मुस्लिम पिशाच आक्रमणकारियों के भारत पर हमले करने के बाद ही, हिन्दुओं को अपनी कई प्राचीन परम्पराएं तोड़ने को विवश होना पडा था .

मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा भारत पर अतिक्रमण करने के बाद भारतीयों पर बहुत अत्याचार किये गये.

यह आक्रमणकारी पिशाच हिन्दुओं के विवाह के समय वहां पहुचकर लूटपाट मचाते थे. कामुक अकबर के शासन काल में, जब अत्याचार चरमसीमा पर थे, मुग़ल सैनिक हिन्दू लड़कियों को बलपूर्वक उठा लेते थे और उन्हें अपने आकाओं को सौंप देते थे.

hinduo me vivah ratri me kyu hota hai?


भारतीय ज्ञात इतिहास में सबसे पहली बार रात्रि में विवाह सुन्दरी और मुंदरी नाम की दो ब्राह्मण बहनों का हुआ था, जिनकी विवाह दुल्ला भट्टी ने अपने संरक्षण में ब्राह्मण युवकों से कराया था. उस समय दुल्ला भट्टी ने अत्याचार के खिलाफ हथियार उठाये थे.

दुल्ला भट्टी ने ऐसी अनेकों लड़कियों को मुगलों से छुडाकर, उनका हिन्दू लड़कों से विवाह कराया |

उसके बाद मुस्लिम आक्रमणकारियों के आतंक से बचने के लिए हिन्दू रात के अँधेरे में विवाह करने लगे.

लेकिन रात्रि में विवाह करते समय भी यह ध्यान रखा जाता है कि - नाच -गाना, दावत, जयमाल, आदि भले ही रात्रि में हो जाए लेकिन वैदिक मन्त्रों के साथ फेरे प्रातः पौ फटने के बाद ही हों.

पंजाब से प्रारम्भ हुई परंपरा को पंजाब में ही समाप्त किया गया . फिल्लौर से लेकर काबुल तक महाराजा रंजीत सिंह का राज हो जाने के बाद उनके सेनापति हरीसिंह नलवा ने सनातन वैदिक परम्परा अनुसार दिन में खुले आम विवाह करने और उनको सुरक्षा देने की घोषणा की थी. हरीसिंह नलवा के संरक्षण में हिन्दुओं ने दिनदहाड़े - बैंडबाजे के साथ विवाह शुरू किये.

तब से पंजाब में फिर से दिन में विवाह का प्रचालन शुरू हुआ. पंजाब में अधिकांश विवाह आज भी दिन में ही होते हैं. अन्य राज्य भी धीरे धीरे अपनी जड़ों की ओर लोटने लगे है, हरीसिंह नलवा ने मुसलमान बने हिन्दुओं की घर वापसी कराई,

 मुसलमानों पर जजिया कर लगाया, हिन्दू धर्म की परम्पराओं को फिर से स्थापित किया , इसीलिए उनको “पुष्यमित्र शुंग” का अवतार कहा जाता है ।

पेट के कीड़े मारने की आयुर्वेदिक नुस्खे, pet ke kide marne ki ayurvedic nuskhe

pet ke kide marne ki ayurvedic nuskhe
pet ke kide marne ki ayurvedic nuskhe

पेट के कीड़ों को पेट में ही नष्ट करने का घरेलू उपाय

पेट में कीड़ों की समस्या अधिकतर छोटे बच्चों में देखी जाती है परंतुऐसा बिल्कुल नहीं है कि यह छोटे बच्चों के अलावा बड़ों में नहीं होती।यह समस्या यानी पेट में कीड़े पड़ने की समस्या छोटे या बड़े किसी कोभी उत्पन्न हो सकती है

पेट में कीड़े होने के लक्षण और आयुर्वेदिक इलाज

इस समस्या में मानव शरीर के पेट में कीड़ेउत्पन्न हो जाते हैं और मानव द्वारा खाया गया भोजन मानव के बजायपेट में पनप रहे कीड़ों की भूख मिटाता है। जिससे धीरे धीरे मानव कोशरीर में कमजोरी व जल्दी थकान सी महसूस होने लगती है।

 पेट मेंकीड़े पड़ने से समस्या से ग्रसित व्यक्ति के पाचन क्रिया पर भारी असरपड़ता है या कहे कि पाचन क्रिया कमजोर होने लगती है

पेट के कीड़ों को नष्ट करने का घरेलू उपाय

पीड़ितव्यक्ति में पाचन क्रिया के कमजोर होने से व्यक्ति को भूख भी कमलगती है। इस रोग की पहचान अधिकतर तब हो पाती हैजब किसी व्यक्ति को कभी अचानक से पेट में दर्द हो उठता है और तब किसी चिकित्सक के माध्यम से जांच कराने पर पता लगता है कि पेट में कीड़े या क्रमी उत्पन्न हो गए हैं। यदि चर्चित समस्या का उचित समय पर उचित उपचार न किया जाए तो यह कीड़े कुछ समय के बाद फेंफडों तक पहुंच जाते हैं जो आगे चलकर अस्थमा की समस्या को जन्म देते हैं।

इस समस्या को छोटे बच्चों में पहचान करने का एक लक्षण है कि यह समस्या जब किसी छोटे बच्चे को उत्पन्न होती हैं तो उनके शारीरिक विकास में रुकावट आने लगती है और पेट में कीड़े होने से बच्चे अधिकांश पेट में दर्द होने की शिकायत करते हैं।
पेट में व आंतों में पनप रहे कीड़ों की छुट्टी कर देगा यह घरेलू उपचार
छोटे बच्चों व बड़े लोगों के पेट में कीड़े होने के कई कारण हो सकते हैं जैसे कम पका हुआ भोजन या संक्रमित जलपान करना या साफ सफाई का ध्यान ना रखने से भी कीड़े आंतों में पनपने लगते हैं।

पेट में कीड़े होने के लक्षण

1.  वजन कम होना
2. जी मिचलाना या उल्टी आना
3. पेट दर्द होना
4. जीभ सफेद होना
5. मुंह से दुर्गंध आना
6. आंखें लाल होना
7. गुप्तांगों पर खुजली होना
8. गालों पर धब्बे होना
9. मल त्याग करते समय खून आना या रक्त स्त्राव होना
10.  दस्त लगना

पहला उपचार
3 साल से 5 साल तक के बच्चों के लिए उपचार
अजवाइन का चूर्ण आधा ग्राम की मात्रा में लेकर समभाग गुड में गोली बनाकर दिन में 3 बार खिलाने से सभी प्रकार के पेट के कीड़े नष्ट हो जाते है।

pet ke kide marne ki ayurvedic ilaj

दूसरा उपचार प्रातः उठते ही बच्चों को 10 ग्राम और बड़े व्यक्तियों को 25 ग्राम गुड़ खाकर 12 से 15 मिनट आराम करें इससे आंतों में चिपके हुए सभी कीड़े निकल कर एक जगह जमा हो जाएंगे फिर बच्चों आधा ग्राम और बड़ों को 1 से 2 ग्राम की मात्रा में अजवाइन का चूर्ण बासी पानी के साथ खाएं इससे आंतों में मौजूद सभी प्रकार के कीड़े नष्ट होकर मल के साथ मल के रास्ते से शीघ्र ही बाहर आ जाएंगे।

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तीसरा उपचार अजवाइन का चूर्ण आधा ग्राम की मात्रा में चुटकी भर काला नमक मिलाकर रात के समय नित्य गर्म पानी के साथ देने से बालकों के कृमि नष्ट हो जाते हैं व बड़े व्यक्ति अजवाइन का चूर्ण 4 भाग व काला नमक की मात्रा एक भाग तैयार मिश्रण में से 2 ग्राम चूर्ण गर्म पानी के साथ सेवन करें।

पेट के कीड़े मारने की आयुर्वेदिक इलाज

विशेष दूषित जल के सेवन से बच्चों के पेट में कृमि से बचने के लिए भी इस विधि से सेवन करना चाहिए इससे वायु गोला और अफारा का नाश होता है।

पेट के कीड़े मारने की आयुर्वेदिक नुस्खे

चौथा उपचार केवल अजवाइन का चूर्ण आधा ग्राम की मात्रा में60 से 70 ग्राम की मात्रा में मट्ठे या छाछ के साथ और बड़े व्यक्तियों को2 ग्राम की मात्रा में 125 ग्राम मट्ठे के साथ देने से पेट के कीड़े नष्टहोकर मल के साथ बाहर निकल जाते हैं।

पेट के कीड़े मारने की आयुर्वेदिक दवा

विशेष  3 दिन से 1 सप्ताह तक आवश्यकतानुसार लें। इससे पेट के कीड़े  दूर  होकर  बच्चों का सोते समय दांत किटकिटाना और चबाना दूरहोता है अजवाइन एक कृमिनाशक अत्यंत उत्तम औषधि है। मिठाई, गरिष्ट पदार्थ, नशीले पदार्थ का सेवन बंद कर दें। टाफी, चॉकलेट औरमीठी वस्तुओं का सेवन बंद कर दें। जिन व्यक्तियों को रात में बार - बारपेशाब करने की आदत हो उन्हें भी इससे लाभ मिलता है कृमी  जन्य सभी  विकार  दूर होने के  साथ साथ अर्जीण आदि रोग भी कुछ दिनों में दूर हो जाते हैं।

आरती कैसे करना चाहिए,क्या है आरती का महत्व, kaise karna chahiye, kya hai aarti ka mahatva

aarti ka mahatva
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आरती कैसे करना चाहिए,क्या है आरती का महत्व,आरती कितने प्रकार की होती है ?

आरती के महत्व की चर्चा सर्वप्रथम “स्कन्द पुराण” में की गयी है। आरती हिन्दू धर्म की पूजा परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है। किसी भी पूजा पाठ, यज्ञ, अनुष्ठान के अंत में देवी-देवताओं की आरती की जाती है। आरती की प्रक्रिया में, एक थाल में ज्योति और कुछ विशेष वस्तुएं रखकर भगवान के समक्ष घुमाते हैं।

आरती कैसे करें

थाल में अलग अलग वस्तुओं को रखने का अलग अलग महत्व होता है पर सबसे ज्यादा महत्व होता है, आरती के साथ गाई जाने वाली स्तुति का. जितने भाव से आरती गाई जायेगी, उतना ही ज्यादा यह प्रभावशाली होगी।

आरती का अर्थ

आरती का अर्थ है पूरी श्रद्धा के साथ परमात्मा की भक्ति में डूब जाना। आरती को नीराजन भी कहा जाता है। नीराजन का अर्थ है विशेष रूप से प्रकाशित करना। यानी कि देव पूजन से प्राप्त होने वाली सकारात्मक शक्ति हमारे मन को प्रकाशित कर दें। व्यक्तित्व को उज्जवल कर दें। बिना मंत्र के किए गए पूजन में भी आरती कर लेने से पूर्णता आ जाती है।

स्कंद पुराण में भगवान की आरती के संबंध में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति मंत्र नहीं जानता हो,पूजा की विधि भी नहीं जानता हो। लेकिन भगवान की आरती की जा रही हो और उस पूूजन कार्य में श्रद्धा के साथ शामिल होकर आरती करें,तो भगवान उसकी पूजा को पूरी तरह से स्वीकार कर लेते हैं।

आरती दीपक से क्यों

रुई के साथ घी की बाती जलाई जाती है। घी समृद्धि प्रदाता है। घी रुखापन दूर कर स्निग्धता प्रदान करता है। भगवान को अर्पित किए गए घी के दीपक का मतलब है कि जितनी स्निग्धता इस घी में है। उतनी ही स्निग्धता से हमारे जीवन के सभी अच्छे कार्य बनते चले जाएं। कभी किसी प्रकार की रुकावटों का सामना न करना पड़े।

आरती में शंख ध्वनि और घंटा ध्वनि क्यों-

आरती में बजने वाले शंख और घंटी के स्वर के साथ,जिस किसी देवता को ध्यान करके गायन किया जाता है। उससे मन एक जगह केन्द्रित होता है,जिससे मन में चल रहे विचारों की उथल-पुथल कम होती जाती है। शरीर का रोम-रोम पुलकित हो उठता है,जिससे शरीर और ऊर्जावान बनता है।
आरती कर्पूर से क्यों
कर्पूर की महक तेजी से वायुमंडल में फैलती है। ब्रह्मांड में मौजूद सकारात्मक शक्तियों(दैवीय शक्तियां)को यह आकर्षित करती है। आरती वह माध्यम है जिसके द्वारा देवीय शक्ति को पूजन स्थल तक पहुंचने का मार्ग मिल जाता है।

4. आरती करते हुए भक्त के मन में ऐसी भावना होनी चाहिए कि मानो वह पंच-प्राणों(पूरे मन के साथ)की सहायता से ईश्वर की आरती उतार रहा हो। घी की ज्योति को आत्मा की ज्योति का प्रतीक मानना चाहिए। यदि भक्त अंतर्मन से ईश्वर को पुकारते हैं तो यह पंचारती कहलाती है।

5. आरती दिन में एक से पांच बार की जा सकती है। घरों में आरती दो बार की जाती है। प्रातःकालीन आरती और संध्याकालीन आरती

दीपभक्ति विज्ञान के अनुसार आरती से पहले भगवान को नमस्कार करते हुए तीन बार फूल अर्पित करना चाहिए।

आरती करने की विधि

7. उसके बाद एक दीपक में शुद्ध घी लेकर उसमें विषम संख्या में यानी कि 3,5 या 7 बत्तियां जलाकर आरती करनी चाहिए। सामान्य तौर पर पांच बत्तियों से आरती की जाती है,जिसे पंच प्रदीप भी कहते हैं। इसके बाद कर्पूर से आरती की जाती है। कर्पूर का धुंआ वायुमंडल में जाकर मिलता है। यहां धुआं हमारे पूजन कार्य को ब्रंह्माडकीय शक्ति तक पहुंचाने का कार्य करता है।

किसी विशेष पूजन में आरती पांच चीजों से की जा सकती है। पहली धूप से, दूसरी दीप से, तीसरी धुले हुए वस्त्र से, कर्पूर से,पांचवी जल से।

कैसे सजाना चाहिए आरती का थाल,

आरती करने की पूरी विधि के बारे में।

आरती के थाल में एक जल से भरा लोटा, अर्पित किए जाने वाले फूल, कुमकुम, चावल, दीपक, धूप, कर्पूर, धुला हुआ वस्त्र, घंटी, आरती संग्रह की किताब रखी जाना चाहिए। थाल में कुमकुम से स्वस्तिक की आकृति बना लें। थाल पीतल या तांबे का लिया जाना चाहिए।

आरती करने की विधि?

भगवान के सामने आरती इस प्रकार से घुमाते हुए करना चाहिए कि ऊँ जैसी आकृति बने।
2. अलग-अलग देवी-देवताओं के सामने दीपक को घुमाने की संख्या भी अलग है, जो इस प्रकार है।
भगवान शिव के सामने तीन या पांच बार घुमाएं।
भगवान गणेश के सामने चार बार घुमाएं।
भगवान विष्णु के सामने बारह बार घुमाएं।
भगवान रूद्र के सामने चौदह बार घुमाएं।
भगवान सूर्य के सामने सात बार घुमाएं।
भगवती दुर्गा जी के सामने नौ बार घुमाएं।
अन्य देवताओं के सामने सात बार घुमाएं।

यदि दीपक को घुमाने की विधि को लेकर कोई उलझन हो रही हो तो आगे दी गई विधि से किसी भी देवी या देवता की आरती की जा सकती है।

3. आरती अपनी बांई ओर से शुरू करके दाईं ओर ले जाना चाहिए। इस क्रम को सात बार किया जाना चाहिए। सबसे पहले भगवान की मूर्ति के चरणों में चार बार, नाभि देश में दो बार और मुखमंडल में एक बार घुमाना चाहिए। इसके बाद देवमूर्ति के सामने आरती को गोलाकार सात बार घुमाना चाहिए।

4. पद्म पुराण में आरती के लिए कहा गया है कि कुंकुम, अगर, कपूर, घी और चन्दन की सात या पांच बत्तियां बनाकर अथवा रुई और घी की बत्तियां बनाकर शंख, घंटा आदि बजाते हुए आरती करनी चाहिए।

5. भगवान की आरती हो जाने के बाद थाल के चारों ओर जल घुमाया जाना चाहिए, जिससे आरती शांत की जाती है।

6. भगवान की आरती सम्पन्न हो जाने के बाद भक्तों को आरती दी जाती है। आरती अपने दाईं ओर से दी जानी चाहिए।

7. सभी भक्त आरती लेते हैं। आरती लेते समय भक्त अपने दोनों हाथों को नीचे को उलटा कर जोड़ते हैं। आरती पर से घुमा कर अपने माथे पर लगाते हैं। जिसके पीछे मान्यता है कि ईश्वरीय शक्ति उस ज्योत में समाई रहती हैं। जिस शक्ति का भाग भक्त माथे पर लेते हैं। एक और मान्यता के अनुसार इससे ईश्वर की नजर उतारी जाती है। जिसका असली कारण भगवान के प्रति अपने प्रेम व भक्ति को जताना होता है।

पूजा के बाद क्यों जरूरी है आरती ?

घर हो या मंदिर, भगवान की पूजा के बाद घड़ी, घंटा और शंख ध्वनि के साथ आरती की जाती है। बिना आरती के कोई भी पूजा अपूर्ण मानी जाती है। इसलिए पूजा शुरू करने से पहले लोग आरती की थाल सजाकर बैठते हैं। पूजा में आरती का इतना महत्व क्यों हैं इसका उत्तर स्कंद पुराण में मिलता है। इस पुराण में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति मंत्र नहीं जानता, पूजा की विधि नहीं जानता लेकिन आरती कर लेता है तो भगवान उसकी पूजा को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेते हैं।

आरती का धार्मिक महत्व होने के साथ ही वैज्ञानिक महत्व भी है। याद कीजिए आरती की थाल में कौन कौन सी वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है। आपके जेहन में रुई, घी, कपूर, फूल, चंदन जरूर आ गया होगा। रुई शुद्घ कपास होता है इसमें किसी प्रकार की मिलावट नहीं होती है। इसी प्रकार घी भी दूध का मूल तत्व होता है। कपूर और चंदन भी शुद्घ और सात्विक पदार्थ है।
जब रुई के साथ घी और कपूर की बाती जलाई जाती है तो एक अद्भुत सुगंध वातावरण में फैल जाती है। इससे आस-पास के वातावरण में मौजूद नकारत्मक उर्जा भाग जाती है और सकारात्मक उर्जा का संचार होने लगता है।
आरती में बजने वाले शंख और घड़ी-घंटी के स्वर के साथ जिस किसी देवता को ध्यान करके गायन किया जाता है उसके प्रति मन केन्द्रित होता है जिससे मन में चल रहे द्वंद का अंत होता है। हमारे शरीर में सोई आत्मा जागृत होती है जिससे मन और शरीर उर्जावान हो उठता है। और महसूस होता है कि ईश्वर की कृपा मिल रही है।

मधुमेह डायबिटीज के लक्षण और आयुर्वेदिक इलाज, diabetes ka ayurvedic ilaj

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diabetes ke lakshan aur upchar

मधुमेह के दौरान आपका शरीर आमतौर पर निर्जलित हो जाता है। निर्जलीकरण में आपको बहुत प्यास लगती है।

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रक्त में अतिरिक्त शुगर की उपस्थिति के कारण गुर्दे रक्त को साफ करने के लिए अधिक काम करने लगते हैं और मूत्र के द्वारा अतिरिक्त शुगर को शरीर से बाहर निकालते हैं। इस कारण बार बार पेशाब आता है। अत्यधिक प्यास लगना और बार बार पेशाब आना यह मधुमेह होने के प्रमुख लक्षण हैं।

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कोशिकाओं में ग्लूकोज़ नही पहुंचने के कारण शरीर की ऊर्जा आपूर्ति पूरी तरह से नही हो पाती है और मधुमेह का रोगी हमेशा थकान महसूस करता है और उसे जल्दी भूख लगने लगती है।

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मधुमेह से पीड़ित पुरुषों और महिलाओं को हाथ और पैर की उंगलियों के बीच, सेक्स अंगों के आसपास और स्तन के नीचे यीस्ट इनफ़ेक्शन हो सकता है।

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यदि रक्तधारा में रक्त शर्करा का स्तर ठीक से संतुलित नहीं होता है, तब यह तंत्रिका या किसी भी अंग की क्षति का कारण बन सकता है जिससे आपके शरीर के घावों को ठीक होने में मुश्किल होती है।

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वज़न में कमी, मतली और उल्टी, बाल गिरना, धुँधली दृष्टि, त्वचा का सूखापन या खुजली होना मधुमेह के कुछ अन्य लक्षण हैं। अगर इसका समय से इलाज़ ना किया जाए तो गुर्दे की विफलता, दिल का दौरा या स्ट्रोक, अंधापन, तंत्रिका क्षति आदि के रूप में गंभीर जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है।

sugar me kya nahi khana chahiye

यह एक सामान्य धारणा है कि चीनी मधुमेह का कारण है, लेकिन मधुमेह के पीछे का असली कारण स्टार्च है। पाचन के दौरान, स्टार्च ग्लूकोज़ में टूट जाता है जो चीनी का एक प्रकार है। इसलिए मधुमेह के रोगी चीनी खा सकते हैं पर उचित मात्रा में। अपने आहार में अपने कार्बोहाइड्रेट को नियंत्रित कर अपने मधुमेह को नियंत्रित करें।

sugar khatam karne ka tarika

मधुमेह से बचाव का सबसे बढ़िया तरीका है इसकी जानकारी रखना और स्वस्थ जीवनशैली अपनाना।

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100 ग्राम नीम के पत्तों का पाउडर,100 ग्राम जामुन गुठलियों का पाउडर, 100 ग्राम बिल्वपत्र पाउडर, 100 ग्राम करेले का पाउडर, 100ग्राम मेथी दाना पाउडर, 100 ग्राम विजयसार पाउडर 100 ग्राम गुड़मार पाउडर इन सातों चीजों के पाउडर को मिक्स करके डब्बे में भर लें खाना खाने के 1 घंटे पहले सुबह शाम सेवन करें 5 दिवस में लाभदायक असर चालू हो जाएगा सेवन करने के 15 दिन बाद diabites की जांच कराएं चमत्कारिक परिणाम मिलेगा

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आजमाया हुआ है निस्संकोच प्रयोग करें आवश्यक समझें तो अपने नजदीकी आयुर्वेदिक चिकित्सक से सलाह लें निरापद नुस्खा है लाखों मधुमेह पीड़ित इसका सेवन कर रहे है और स्वस्थ जीवन बिता रहे है।